किसान।।।।
किसान
उलझनों में सोच है,
ये शायद सोच का ही दोष है,
दोषियों का कोश है,
या कोशियों का दोष है,
किसानों का आक्रोश है,
कहा वो ज्ञानकोष है,
जिसपे लिखे उनके कर्म है,
खेती सा न कोई धर्म है,
ये महज़ ही एक विचार है,
जो धूप में हुए तार तार है,
अन्न से जिनके चला ये संसार है,
कहा उनका पोश है,
दशा पे उनकी,
हर कोई जिम्मेदार है,
चंद शब्दो का ये सरोश है,
अन्न देने वाला
आज भी बिना पोश खामोश है
ये तेरा भी दोष है,
ये मेरा भी दोष है,
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